वासना दुर कैसे करें ||एक साधु की कहानी

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एक साधु की कहानी

 आज इस कहानी में मैं आपको वही बताता हूं की इंसान की में कौन-कौन सी गलतियां हैं जो इंसान को बर्बाद कर देती है अपनी बर्बादी के कारण पता चल जाए तो हम अपने जीवन को सुखमय बना सकते हैं बहुत समय पहले की बात है एक नगर में एक धनी सेट रहा करता था उस सेठ के पास सभी प्रकार की सुख सुविधाएं थी लेकिन उसके कोई संतान नहीं थी संतान के दुख में वह हमेशा चिंतित रहता था 


फिर एक दिन उसे पता चलता है की उसकी पत्नी गर्भवती है और उसने अपनी पत्नी का खूब ख्याल रखा ऐसे में एक दिन उसके घर पर एक पुत्र का जन्म हुआ सेठ पुत्र के जन्म पर बहुत प्रसन्न था उसने पूरे नगर में मिठाई बांटी और उसके ललन पालन में कोई कमी नहीं छोड़ी देखते ही देखते उसका पुत्र बड़ा हो गया फिर सेठ ने उसे पुत्र को गुरुकुल भेजने का निर्णय किया ताकि वो पढ़ लिखकर एक विद्वान बन सके अभी उसके पुत्र की उम्र ज्यादा नहीं हुई थी लेकिन उसने छोटी सी उम्र में अपने बेटे को शिक्षा ग्रहण करने के लिए गुरुकुल भेज दिया था


 गुरुकुल में वह बालक अच्छे से शिक्षा ग्रहण करता अपने गुरु की सभी आज्ञा का पालन करता ऐसे में वह बालक धीरे-धीरे वहां का सबसे होनहार विद्यार्थी बन गया गुरुकुल में उस बालक ने सारे वेद पुराण और शास्त्रों का अध्ययन किया और बहुत बड़ा विद्वान बन गया लेकिन वो कहते हैं ना की समय कब बदल जाए किसी को भी पता नहीं होता


 ऐसे ही एक दिन किसी प्राकृतिक आपदा की वजह से उसके माता-पिता की मृत्यु हो गई और जब उसके माता-पिता की मृत्यु हुई तब तक उसे बालक की शिक्षा पूर्ण नहीं हुई थी और जब उसे बालक ने इस खबर को सुना की उसके माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं रहे और उनका सब कुछ बर्बाद हो चुका है तो उसे बालक का इस सांसारिक मोह माया से नजर उठ गया उसके बाद उस बालक ने निश्चय किया की वह गुरुकुल से शिक्षा पूर्ण करने के बाद अपना संपूर्ण जीवन लोगों की भलाई में व्यतीत करेगा 


 फिर जब उस बालक की शिक्षा पूर्ण हो गई तो उसके बाद वह बालक सन्यासी बन गया और वह सांसारिक वस्तुओं से दूर हिमालय के जंगल में चला गया जंगल में जाकर उसने वहां लंबे समय तक तपस्या की तपस्या पूर्ण करने के बाद उसने सन्यासी लोगों को शिक्षा देना आराम कर दिया


 समय के साथ-साथ उसे सन्यासी की चर्चा चारों तरफ होने लगी और दूर-दूर से लोग उसके पास शिक्षा ग्रहण करने आने लगे और बहुत से लोग उनके पास अपनी समस्याओं का समाधान खोजने के लिए भी आने लगे सन्यासी सभी लोगों की समस्याएं बढ़ि आसानी से सुलझा देता जिस वजह से वह पूरे राज्य में मशहूर हो गया था 


लेकिन जिस नगर में वो रहता था उसे नगर का राजा एक कुरूर व्यक्ति था जब राजा को उस सन्यासी के बारे में पता चला तो उसने उस सन्यासी से मिलने का निश्चय किया अगली सुबह को राजा अपने महल से निकलकर उस सन्यासी से मिलने के लिए निकल गया और फिर वो उसके कुटिया पर जाकर पहुंच गया वहां पहुंचकर जब राजा ने उसे सन्यासी को देखा तो वह देखता ही रह गया उसके चेहरे पर एक अलग ही देश था जब वह सन्यासी के पास पहुंचा तो उसे बड़ी अपार शांति का अनुभव हुआ उस राजा ने उस सन्यासी को प्रणाम किया और पास बैठ गया और उससे वार्तालाप करने लगा 


वो राजा पहले ही मुलाकात में उस सन्यासी के व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हुआ की उसने उसी समय से अच्छाई की राह पर चलने की ठान ली और मन ही मन सोचने लगा की इतनी छोटी सी मुलाकात में यह सन्यासी मुझे इतना बदल सकता है तो अगर यह हमेशा मेरे साथ ही रहने लगे तो मेरी जिंदगी बदल जाएगी और यही सोचकर राजा सन्यासी से अपने महल चलने के लिए आग्रह करने लगा राजा का आग्रह सुनकर सन्यासी माना नहीं कर पाया और वो राजमहल चलने को तैयार हो गया फिर राजा सन्यासी को लेकर राजमहल की ओर चल दिया राजमहल पहुंचने पर राजा ने सन्यासी का खूब आदर सम्मान किया और उसके बाद राजा ने सन्यासी को एक सही कमरे में भोजन करवाया भोजन करने के बाद सन्यासी ने राजा को धन्यवाद दिया और राजा से जाने की आज्ञा मांगी यह सुनकर राजा ने कहा की आप हमारे बाग में जब तक चाहे तब तक रह सकते हैं  


आपको यहां पर किसी भी प्रकार की कोई असुविधा नहीं होगी और आप यहां रहेंगे तो हमारी प्रजा को भी अच्छा लगेगा और हमें भी अच्छा लगेगा यह सुनकर सन्यासी ने राजा का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया उसके बाद राजा ने सेवकों से कहा की सन्यासी महाराज के लिए बगीचे में रहने का खाने का और वस्त्र आदि का प्रबंध किया जाए राजा की आज्ञा के अनुसार सेवकों ने एक सुंदर सी कुटिया का निर्माण कर दिया उसके बाद वह सन्यासी उसी कुटिया में रहने लगी सन्यासी को उसे कुटिया में रहते रहते कहीं साल बीत गए और इस दौरान राजा ने उनकी खूब सेवा की परंतु कहीं सालों बाद एक दिन राजा और रानी को आवश्यक कार्य के लिए दूसरे राज्य जाना पड़ा  


लेकिन उन्होंने एक सेवादार को सन्यासी की सेवा के लिए नियुक्त कर दिया परंतु वह सेवादार राजा के जाने के बाद बीमार पड़ गई और अपने घर चला गया और कभी लौटकर वापस नहीं


तो सन्यासी ने क्रोध में आकर उस राजा को खूब सुनाया राजा से कहा की राजन जो जिम्मेदारी तुम पुरी नहीं कर सकते तो वह उठाते ही क्यों हो तब राजा ने सन्यासी से क्षमा मांगते हुए कहा की भगवान यदि मुझसे कोई भूल हो गई हो तो मैं उसके लिए आपसे क्षमा मांगता हूं मुझे क्षमा कर दीजिए और आप अपना क्रोध शांत कीजिए और मुझे बताइए की आखिर हुआ क्या है यह सुनकर उस सन्यासी ने कहा की तुम्हारे जाने के बाद मुझे यहां पर किसी ने भोजन नहीं दिया और मैं बहुत दिनों तक भूखा ही रहा मुझे यहां पर आकर किसी ने पूछा तक नहीं की मैं किस हाल में हूं यह सुनकर राजा ने सन्यासी से क्षमा मांगी और कहा की भगवान आज के बाद में ऐसी कोई भी गलती नहीं होगी फिर कुछ देर बाद मामला शांत हो गया जब राजा और सन्यासी के बीच वार्तालाप हो रही थी तो रानी भी यह सब वार्तालाप चुपके सुन रही थी और सब कुछ देख रही थी उसके बाद राजा ने उस सन्यासी को कोई भी शिकायत का मौका नहीं दिया और उसकी खूब सेवा की परंतु कुछ दिनों बाद राजा को फिर किसी आवश्यक कार्य से अपने राज्य से बाहर जाना पड़ा 


लेकिन इस बार राजा ने राज्य से बाहर जाने से पहले अपनी रानी को कहा की जब तक मैं नहीं आऊं तब तक आप स्वयं सन्यासी की देखभाल करोगी यह सुनकर रानी ने कहा की जी महाराज आप निश्चित होकर जाइए मैं सन्यासी महाराज की अच्छे से देखभाल करूंगी उसके बाद रानी हर रोज भोजन बनाकर सन्यासी महाराज को भेज देती थी लेकिन एक दिन रानी नहाने के लिए चली गई और सन्यासी को भोजन देना भूल गई सन्यासी ने काफी देर तक भोजन का इंतजार किया लेकिन जब भोजन नहीं आया तब सन्यासी सोच में पड गया की आज खाना क्यों नहीं आया उसके बाद सन्यासी ने सोचा की वह खुद महल में जाकर देखेगा की आखिर अब तक खाना नहीं आया और फिर वह महल पहुंच गया जब वह महल के अंदर पहुंचा तो वहां उसकी नजर रानी पर पड़ी रानी के लंबे-लंबे काले केस जो की उसकी कमर पर लहरा रही थी उसकी कजरारी आंखें जो देखने मात्रा से ही घायल कर दे उसकी हिरनी जैसी चाल रानी के इतने सुंदर रूप को देखकर सन्यासी चकित हो गया और रानी की सुंदरता सन्यासी के मन में घर बन गई और वह वहां से बिना कुछ कहे ही अपनी कुटिया में लौट आया 


सन्यासी रानी के रूप की सुंदरता को भुला ना सका और वह खाना पीना छोड़कर अपनी कुटिया में पड़ा रहा उसने कई दिनों तक कुछ भी नहीं खाया जिस वजह से वह बहुत कमजोर हो गया फिर कुछ समय बाद राजा वापस लौटे और जब उसे सन्यासी की हालत का पता चला तो वह सीधे सन्यासी के पास पहुंच गए और बोले की ही भगवान क्या बात है आपको क्या हो गया और आप इतने कमजोर कैसे हो गए है और आप किस गहरी सोच में दुबे हो क्या मुझसे कोई भूल हो गई है तब सन्यासी ने कहा की नहीं राजन आपसे कोई भूल नहीं हुई है यह सुनकर राजा ने कहा तो फिर क्या बात है आप मुझे बताइए मैं आपकी परेशानी जरूर दूर करूंगा 


यह सुनकर सन्यासी ने राजा से कहा की राजन मैं आपकी रानी की अद्भुत सुंदरता को देखकर उनकी सुंदरता के फेर में पड गया हूं और अब मैं रानी के बिना जिंदा भी नहीं रह सकता यह सुनकर राजा हैरान हो गया और कुछ देर सोचने के बाद राजा ने उसे सन्यासी से कहा मैं आपको रानी दे दूंगा यह सुनकर सन्यासी बहुत पसंद हुआ फिर राजा सन्यासी को लेकर महल चले गए और जब राजा और सन्यासी महल पहुंचे तो उसे दिन रानी ने अपने सबसे सुंदर वस्त्र और गहने पहने हुए फिर राजा रानी के पास पहुंचे और राजा ने रानी से कहा की कोई सन्यासी की मदद करनी चाहिए यह बहुत कमजोर पड गए हैं और मैं नहीं चाहता की किसी ज्ञानी पुरुष की हत्या का कलंक मेरे सर पर लगे उसके बाद राजा ने रानी से पूछा की क्या आप यह पाप अपने सर पर लेना चाहती हैं 


राजा की यह बात सुनकर रानी ने राजा से पूछा की आखिर इन सन्यासी के इस दुख का कारण क्या है तो राजा ने रानी से कहा की सन्यासी आपकी अद्भुत सुंदरता के दीवाने हो गए हैं राजा की यह बात सुनकर रानी ने कहा की राजन आप चिंता मत करिए


 अब आप सब कुछ मेरे ऊपर छोड़ दीजिए मुझे पता है की मुझे अब क्या करना है उससे आपके ऊपर ना तो सन्यासी की हत्या का पाप लगेगा और ना ही उससे मेरे पवित्र धर्म का नाश होगा रानी की यह बात सुनकर राजा ने रानी को सन्यासी को सौंप दिया 


उसके बाद सन्यासी रानी को लेकर कुटिया पर पहुंचे जब रानी सन्यासी की कुटिया पर पहुंची रानी ने सन्यासी से कहा की हमें रहने के लिए घर चाहिए हम इस झोपड़ी में नहीं रह सकते यह सुनकर सन्यासी राजा के पास गया और राजा से जाकर बोला की राजन‍ हमें रहने के लिए घर चाहिए सन्यासी की बात सुनकर राजा ने उनके लिए घर का प्रबंध कर दिया फिर सन्यासी रानी को लेकर घर पहुंचा जब रानी सन्यासी के साथ उसे घर पर पहुंची तो रानी ने सन्यासी से कहा की यह घर तो बहुत गंदा है और इसकी हालत बहुत खराब है मैं इस घर में नहीं रह सकती यह सुनकर सन्यासी फिर से राजा के पास गया और राजा के पास जाकर बोला की राजन जो आपने हमें घर दिया है उस घर की हालत बहुत खराब है सन्यासी की बात सुनकर राजा ने उसे घर की हालत ठीक करवा दी उसके बाद फिर रानी घर के अंदर गई और नहा धोकर बिस्तर पर आ गई


 फिर सन्यासी भी बिस्तर पर आ गया फिर उसके बाद रानी ने सन्यासी से कहा की आपको पता है की आप कौन हैं और आप क्या बन गए हैं आप एक महान सन्यासी हैं जिसके लिए राजा स्वयं सारी जरूरत की वस्तुएं उपलब्ध करते है जिसके पास लोग दूर-दूर से ज्ञान ग्रहण करने आते जो लोगों को सत्य की रह दिखाया करते जो लोगों की समस्याओं का समाधान करते जिनको सभी लोग एक गुरु मानते जिनकी सब भगवान के रूप में पूजा किया करते और आज आप वासना के कारण मेरे गुलाम हो गए हैं रानी की यह बात सुनकर उसे सन्यासी को एक झटका लगा और उसे महसूस हुआ की वह तो एक सन्यासी है और वह यह सब क्या कर रहा है वह तो यह सारी सुख सुविधाओं को छोड़कर शांति की तलाश में जंगलों में चला गया




वह सन्यासी जोर जोर से रोने लगा और चिल्लाने लगा और रानी से कहने लगा की मुझे क्षमा कीजिए महारानी मैं यह क्या करने जा रहा था मैं अभी आपको राजा को सौंप कर आता हूं सन्यासी की बात सुनकर रानी ने सन्यासी से प्रश्न किया की महाराज मेरे मैन में एक प्रश्न उठ रहा है


 कृपया मेरे प्रश्न का उत्तर दीजिए रानी की बात सुनकर सन्यासी ने कहा की पूछो तुम्हारा क्या प्रश्न है फिर रानी ने कहा की जब आपको उस दिन भोजन नहीं मिला तो आप बहुत क्रोधित हो गए तब मैंने आपके ये रूप पहली बार देखा था और तभी से मैं आपकी व्यवहार में परिवर्तन महसूस कर रही हूं ऐसा क्यों हुआ महाराज आखिर आपको इतना क्रोध क्यों आया रानी की बात सुनकर सन्यासी ने रानी को समझाया की जब मैं जंगल में था तो मुझे समय पर भोजन भी नहीं मिलता था 


लेकिन जब मैं महल में आया तो महल में आने के बाद मुझे सारी सुख सुविधाएं मिली और फिर मैं इन सभी सुख सुविधाओं में फस गया और मुझे इसके प्रति लगाव उत्पन्न हो गया और फिर मुझे इसको पाने का लालच उत्पन्न हो गया और जब मुझे यह नहीं मिला तो मेरे अंदर क्रोध उत्पन्न हुआ फिर सन्यासी ने कहा की महाराज सच तो यह है की अगर इच्छा पुरी नहीं हो तो क्रोध उत्पन्न होता है और अगर इच्छा पुरी हो जाए तो लालच बड जाता है फिर सन्यासी ने रानी से कहा यह इच्छा की पूर्ति ही मुझे वासना के द्वार तक लेकर आई है और मैं आपके प्रति आकर्षित हो गया इसके बाद वो सन्यासी रानी को लेकर राजा के पास गया और बोला की राजन मुझे क्षमा कर दीजिए 


मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया है यह लो आपकी रानी मुझे यह सब नहीं चाहिए मैं अपनी इच्छा से होकर यह गलत कार्य करने जा रहा था और अपने जीवन को बर्बाद कर रहा था लेकिन अब मुझे सब कुछ समझ आ गया है उसके बाद उस सन्यासी ने कहा की राजन मनुष्य की बर्बादी का कारण उसकी चार आदते बनती है और दुनिया की हर एक व्यक्ति के अंदर यह चार अवगुण होते हैं लेकिन जो व्यक्ति इन पर नियंत्रण का लेता है वह दुख और परेशानियों से बच जाता है वहीं जो व्यक्ति इन चारों पर नियंत्रण नहीं कर पता है वो बर्बाद होने के कगार पर पहुंच जाता है यह सुनकर राजा ने कहा की महाराज आप मुझे वो चार आदते बताइए 


जिससे की मनुष्य की बर्बादी हो जाती है फिर सन्यासी ने राजा को मनुष्य को बर्बाद करने वाली आदतों के बारे में बताया की राजन मनुष्य को बर्बाद करने वाली 


पहली आदत है इच्छा क्योंकि इच्छा ही दुनिया की हर एक व्यक्ति के अंदर सबसे पहला अवगुण होता है और जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं को नियंत्रण में नहीं रख पता है वह जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं हो पता है क्योंकि जैसे ही उसकी एक इच्छा पुरी होती है 


वह दूसरी की ओर बढ़ाने लगता है और दूसरी पुरी होती है तो तीसरी इच्छा उसके मन में जागृत हो जाती है और फिर ऐसे करते-करते इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं होने के कारण इसी जाल में फस जाता है और दुखी हो जाता है इसीलिए राजन जब हम इच्छाओं पर नियंत्रण कर लेते हैं तो हम हमारे मन पर भी नियंत्रण कर लेते हैं और जब हमारा मन हमारे बस में होता है तो हमें सुखी सुखी प्राप्ति होती है फिर जो हम चाहते हैं वहीं हमारे साथ होता है फिर सन्यासी कहता है की राजन मनुष्य को बर्बाद करने वाली 


दूसरी आदत है वासना है वासना का जन्म हमारे मन में उठने वाली इच्छाओं से होता है जिस प्रकार इच्छा का कोई अंत नहीं होता और मनुष्य वासना के जाल में फसता ही चला जाता है वासना में मनुष्यों को कुछ भी नजर नहीं आता है   


आज तक जितनी भी लड़ाइयां हुई है उनका सबसे बड़ा कारण स्त्री को पाने की इच्छा ही रही है स्त्री के प्रेम में होकर राजा महाराजाओं ने आज से पहले बहुत सारे युद्ध किए हैं रावण ने संसार का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति था लेकिन उसने भी सुन्दरता मे आकर अपना सब कुछ बर्बाद कर लिया उसकी मृत्यु का कारण एक स्त्री ही बनी थी क‌ई राजा महाराजा तो युद्ध में इसलिए हर गए क्योंकि वो लोग स्त्रियों  


से रासलीला रचने में ही रह गए ईश्वर ने तो स्त्री की उत्पत्ति इस संसार को बढ़ाने के लिए की है लेकिन आजकल लोगों ने इसे अपनी वासना का शिकार बना लिया है अपने मनोरंजन का साधन समझने लगे हैं और जब उन्हें अपना यह मनोरंजन नहीं मिलता तो वो पागल हो जाते हैं और ना जाने क्या-क्या कर बैठते हैं इसीलिए ही राजन जितना हो सके उतना वासना से दूर रहना चाहिए फिर सन्यासी कहता है की मनुष्यों को बर्बाद करने वाली 

 तीसरी आदत है क्रोध क्योंकि जब मनुष्य की वासना की पूर्ति नहीं होती है तो उसके अंदर क्रोध उत्पन्न हो जाता है और जब व्यक्ति को क्रोध आता है तो उस पर उसका नियंत्रण नहीं होता है और फिर वो क्रोध में आकर कहीं गलत निर्णय ले लेता है वो दूसरों को भला बुरा कर देता है 

गलियां देता है और जब उनका क्रोध शांत होता है तो उन्हें अपनी गलती का एहसास हो जाता है लेकिन तब तक तो सब कुछ बर्बाद हो चुका होता है क्रोध के कारण मनुष्य के कहीं बने बनाए कम भी बिगड़ जाते हैं जब मनुष्य के भीतर क्रोध उत्पन्न होता है तो वो अंदर से बहुत कमजोर हो जाता है और एक कमजोर मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकता है उसे कभी भी सफलता हासिल नहीं हो सकती क्रोध हमारे भीतर तनाव को उत्पन्न करता है और अगर एक बार हम तनाव में चले गए तो हमारा पूरा जीवन बर्बाद हो जाता है फिर सन्यासी कहता है की ही राजा मनुष्य को बर्बाद करने वाली चौथी आदत है लालच है लालच का फल सदैव बुरा होता है लालच में पढ़कर हम बहुत से लोगों का बुरा कर देते हैं 


हर मनुष्य के जीवन में कभी ना कभी ऐसे समस्या आती है जब वह लालच कर बैठता है और अधिक पाने की लालसा में वह कुछ ऐसा कर बैठता है जिससे जो उसके पास था वह उसे भी गवा देता है क्योंकि जैसे ही व्यक्ति की एक इच्छा पुरी होती है उसका लालच बढ़ जाता है और उसके मन में और भी लालच जन्म लेने लगती है जो व्यक्ति लालच करता है वह कामयाबी से कोसों दूर रहता है क्योंकि एक ना एक दिन लालच का दुश्मन सामने आता ही है अगर हम समय रहते ही लालच को त्याग दें और उसकी फेर में ना पड़े तो हम एक सफल व्यक्ति अवश्य बन सकते हैं फिर अंत में सन्यासी राजा से कहता है की अगर मनुष्य चारों आदतों को छोड़ देता है तो उसे जीवन में सफल होने से कोई नहीं रोक सकता जो इन आदतों को नहीं छोड़ता है उसे जीवन में बर्बाद होने से कोई नहीं रोक सकता इसीलिए ही राजन मनुष्यों को इन आदतों से हमेशा बचाना चाहिए




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